वो आखिरी रोटी

 वो आखिरी रोटी

​शहर की चकाचौंध में रहने वाले राहुल ने कई सालों बाद अपने गाँव जाने का फैसला किया। वह अब एक बड़ा अफसर बन चुका था। घर पहुँचते ही उसने देखा कि उसकी माँ रसोई के धुएँ में बैठी चूल्हे पर रोटियाँ बना रही थी। वही पुरानी फटी साड़ी, वही कमजोर हाथ, लेकिन चेहरे पर बेटे को देखने की वही पुरानी चमक।


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​रात को खाने की मेज पर माँ ने राहुल की थाली में गरम-गरम रोटियाँ परोसीं। राहुल ने खाते-खाते ध्यान दिया कि माँ खुद सिर्फ पानी पीकर किनारे बैठ गई।

​राहुल ने पूछा, "माँ, आपने खाना क्यों नहीं खाया?"

​माँ ने मुस्कुराकर कहा, "बेटा, दोपहर को पड़ोस में शादी थी, वहाँ इतना खा लिया कि अभी भूख ही नहीं है। तू आराम से खा।"

​राहुल को कुछ शक हुआ। देर रात जब सब सो गए, राहुल चुपके से रसोई में गया। उसने रोटी के डिब्बे को खोलकर देखा— डिब्बा बिलकुल खाली था। आटे का बर्तन भी साफ था, यानी घर में एक दाना भी नहीं बचा था।

​तभी उसे याद आया कि बचपन में भी जब कभी खाना कम पड़ता था, माँ अक्सर यही कहती थी— "मेरा पेट भरा है" या "आज मेरा व्रत है"। आज इतने सालों बाद भी, वह "अफसर" तो बन गया था, लेकिन अपनी माँ के उस सफ़ेद झूठ को नहीं पकड़ पाया जो वह बरसों से अपने बच्चों के निवाले के लिए बोलती आ रही थी।

​राहुल की आँखों में आँसू आ गए। उसे समझ आया कि कामयाबी की ऊंचाइयों पर चढ़ने के बाद भी, वह अपनी माँ के उस निस्वार्थ प्रेम के आगे आज भी बहुत छोटा है।

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